Wednesday, May 25, 2016

संकटमोचन हनुमानास्टक

बाल समय रवि भक्षि लियो, तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो । 
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो । 
देवन आनि करी विनती तब, छाँडि दियो रवि कष्ट निवारो । 
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।। 

बालि कि त्रास कपीस बसै, गिरिजात महाप्रभु पंश निहारो । 
चौंकि महामुनि शाप दियो, तब चाहिये कौन विचार विचारो । 
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो ।। 

अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो । 
जीवन ना बचिहौं हम सों जु, बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो । 
हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया सुधि प्राण उबारो ।। 

रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षस सों कहि सोक निवारो । 
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो । 
चाहत सीय असोक सों अगिसु, दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ।। 

बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो । 
लै गृह वैद्य सुखेन समेत, तबै गिरि द्रोन सुबीर उपारो । 
आनि संजीवनि हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्राण उबारो ।। 

रावन युद्ध अजान कियो तब, नाग कि फांस सबै सिर डारो । 
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो । 
आनि खगेश तबै हनुमान जु, बन्धन काटि के त्रास निवारो ।। 

बंधु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो । 
देविहिं पूजि भली विधि सों बलि, देऊ सबै मिलि मंत्र बिचारो । 
जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समेत संहारो ।। 


काज किए बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि बिचारो । 
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो । 
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो ।। 
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।। 

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