Tuesday, August 16, 2016

आज मंगलवार है महावीर का वार है, ये सच्चा दरबार है

आज मंगलवार हैमहावीर का वार है सचे ,यह सच्चा दरबार है
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है

चैत सुदी पूनम मंगल का जन्म वीर ने पाया है, जन्म वीर ने पाया है-2
लाल लंगोट गदा हाथ में, सिर पर मुकुट सजाया है, सिर पर मुकुट सजाया है-2
शंकर का अवतार है, महावीर का वार है,
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

ब्रह्माजी के ब्रह्म ज्ञान का फल भी तुम ने पाया है, फल भी तुमने पाया है-2
राम काज शिव शंकर ने वानर का रूप धरया है, वानर का रूप धारया है-2
लीला अपारम्पार है, महावीर का वार है,
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

बालापन में महावीर ने हरदम ध्यान लगाया है, हरदम ध्यान लगाया है-2
श्रंप दिया ऋषियों ने तुम को, ब्रह्म ध्यान लगाया है, ब्रह्म ध्यान लगाया है-2
राम रामा रार है, महावीर का वार है
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह  सच्चा दरबार है

राम जन्म हुआ अयोध्या में कैसा नाच नचाया है, कैसा नाच नचाया है-2
कहा राम ने लक्ष्मण से यह वानर मन को भाया है, यह वानर मन को भाया है-2
राम चरण से प्यार है महावीर का वार है
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

पंचवटी से माता को जब रावण लेकर आया है, जब रावण लेकर आया है-2
लंका में जाकर तुमने माता का पता लगाया है, माता का पता लगाया है-2
आख्शार कुमार है, महावीर का वार है,
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

मेघनाथ ने ब्रह्म पाश में तुमको आन फँसाया है, तुमको आन फँसाया है-2
ब्रह्मपाश में फँसकरके के ब्रह्मा का मान बढ़ाया है,ब्रह्मा का मान बढ़ाया है-2
बज्रंगी वा की मार है, महावीर का वार है,
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है, यह सच्चा दरबार है

लंका जलाई आपने जब रावण भी घबराया है, जब रावण भी घबराया है-2
श्रीराम लखन को आकरके माँ का संदेश सुनाया है, माँ का संदेश सुनाया है-2
सीता शौक अपार है, महावीर का वार है,
सच्चे मन सो जो कोई ध्यावे उसका बेड़ा पार है
आज मंगलवार है, महावीर का वार है सचे ,यह सच्चा दरबार है



Tuesday, May 31, 2016

हनुमान साठिका

जय जय जय हनुमान अडंगी। महावीर विक्रम बजरंगी।।
जय कपीस जय पवन कुमारा। जय जगबन्दन सील अगारा।।
जय आदित्य अमर अविकारी। अति मरदन जय-जय गिरधारी।।
अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा। जय जयकार देवतन कीन्हा।।
बाजे दुंदुभि गगन गम्भीरा। सुर मन हर्ष असुर मन पीरा।।
कपि के डर गढ़ लंक सकानी। छूटे बंध देवतन जानी।।
द्धषि समूह निकट चलि आये। पवन तनय के सिर पद नाये।।
बार बार अस्तुति करि नाना। निर्मल नाम धरा हनुमाना।।
सकल द्धषिन मिलि अस मत ठाना। दीन्ह बताय लाल फल खाना।।
सुनत बचन कपि मन हर्षाना। रवि रथ उदय लाल फल जाना।।
रथ समेत कपि कीन्ह अहारा। सूर्य बिना भए अति अंधियारा।।
विनय तुम्हार करै अकुलाना। तब कपीस की अस्तुति टाना।।
सकल लोक वृतान्त सुनावा। चतुरानन तब रवि उगिलावा।।
कहा बहोरि सुनहु बलसीला। रामचन्द्र करिहैं बहु लीला।।
तब तुम उन्हकर करेहू सहाई। अबहिं बसहु कानन में जाई।।
अस कहि विधि निजलोक सिधारा। मिले सखा संग पवन कुमारा।।
खेलैं खेल महा तरु  तोरैं।  ढेर करै बहु पर्वत फोरैं।
जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई। गिरि समेत पातालहिं आई।।
कपि सुग्रीव बालि की त्रासा।  निरखनित रहे राम मगु आसा।।
मिले रा तहँ पवन कुमार। अति आनन्द सप्रेम दुलारा।।
मनि मुँदरी रघुपति सों पाई। सीता खोज चले सिरु नाई।।
सतयोजन जलनिधि विस्तारा। अगम अपार देवतन हारा।।
जिमि सुर गोखुर सरिस कपीसा। लांघि गये कपि कहि जगदीशा।।
सीता चरण सीस तिन्ह नाये। अजर अमर के आसीस पाये।।
रहे दनुज उपवन रखवारी। एक से एक महाभट मारी।।
तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा। देहउ लंक कोप्यो भुज बीसा।।
सिया बोध है पुनि फिर आये। रामचन्द्र के पद सिर नाये।।
मेरु उपारि आप छिन माहीं। बांधे संतु निमिष इक माही।।
लछमन शक्ति लागी उर जबरीं। राम बुलाय कहा पुनि तबहीं।।
भवन समेत सुषेन लै आये।  तुरत सजीवन को पुनि धाये।।
मग महं कालनेमि कहँ मारा। अमित सुभट निसिचर मँहारा।।
आनि सजीवन गिरि समेता। धरि दीन्हों जहँ कृपा-निकेता।। फनपति केर सो हरि लीन्हा। बर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा।।
अहिरावण हरि अनुज समेता। लै गयो तहाँ पाताल निकेता।।
जहाँ रहे देवी अस्थाना। दीन चहैं बालि काढ़ि कृपाना।।
पवनतनय प्रभु कीन गुहारी। कटक समेत निसाचर मारी।।
रीच कसपति सबै बहोही। राम लषन कीन यह ठोरी।।
सब देवतन की बन्दी छुड़ाये। सो कीरति मुनि नारद गाये।।
अछय कुमार दनुज बलवाना। कालकेतु कहँ सब जग आना।।
कुम्भकरण रावण का भाई। ताहि पात कीन्ह कपिराई।।
मेघनाद पर शक्ति मारा। पवन तनय तब सो बरियारा।।
महा तनय नारन्तक जाना। पल में हते ताहि हनुमाना।।
जहं लगि मान दनुज कर पावा। पवन तनय सब मारि नसावा।।
जय मारुत सुत जय अनुकूला। नाम कृसानु सोक सम तुला।।
जहं जीवन के संकट होई। रवि तम सम सो संकट खोई।।
बन्दी परै सुमिरै हनुमाना। संकट कटै धरै जो ध्याना।।
जाको बाधे बामपद दीन्हा। मारुतसु व्याकुल बहु कीन्हा।।
सो मुजबल का कीन कृपाला। अच्छत तुम्हें मोर यह हाला।।
आरत हरन नाम हनुमाना। सादर सुरपति कीन बखाना।।
संकट रहै न एक रती को। ध्यान धरै हनुमान जती को।।
धावहु देखि  दीनता मोरी। कहौं पवनसुत जुगकर जोरी।।
कपिपति बेगि अनुग्रह करहू। आतुर आइ दुसह दुःख  हरहू।।
राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया। जवन गुहार लाय सिय जाया।।
यश तुम्हार सकल जग जाना। भव बंधन भंजन हनुमाना।।
यह बंधन कर केतिक  बाता। नाम तुम्हार जगत सुखदाता।।
करो कृपा जय जय जग स्वामी। बार अनेक नमामी नमामी।।
भौमवार कर होम विघ्ना। धूप दीप नैवेद्य सुजाना।।
मंगलदायक को लौ लावे। सुर नर मुनि वांछित फल पावे।।
जयति जयति जय जय स्वामी। समरत पुरुष सुर अन्तरजामी।।
अंजनी तय नाम हनुमाना। सो तुलसी के प्राण समाना।।
दोहा जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान।
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण।।
बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण।।
जो नित पढै यह साठिका, तुलसी कहै बिचारि।
रहैं न संकट ताहि को, साक्षी है त्रिपुरारी।।



Wednesday, May 25, 2016

बजरंग बाण

दोहा :
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥


चौपाई :
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥
जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥
बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥
इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥
यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥
यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

दोहा :
उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान।
बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥


संकटमोचन हनुमानास्टक

बाल समय रवि भक्षि लियो, तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो । 
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो । 
देवन आनि करी विनती तब, छाँडि दियो रवि कष्ट निवारो । 
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।। 

बालि कि त्रास कपीस बसै, गिरिजात महाप्रभु पंश निहारो । 
चौंकि महामुनि शाप दियो, तब चाहिये कौन विचार विचारो । 
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो ।। 

अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो । 
जीवन ना बचिहौं हम सों जु, बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो । 
हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया सुधि प्राण उबारो ।। 

रावण त्रास दई सिय को तब, राक्षस सों कहि सोक निवारो । 
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो । 
चाहत सीय असोक सों अगिसु, दे प्रभु मुद्रिका सोक निवारो ।। 

बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो । 
लै गृह वैद्य सुखेन समेत, तबै गिरि द्रोन सुबीर उपारो । 
आनि संजीवनि हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्राण उबारो ।। 

रावन युद्ध अजान कियो तब, नाग कि फांस सबै सिर डारो । 
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो । 
आनि खगेश तबै हनुमान जु, बन्धन काटि के त्रास निवारो ।। 

बंधु समेत जबै अहिरावण, लै रघुनाथ पाताल सिधारो । 
देविहिं पूजि भली विधि सों बलि, देऊ सबै मिलि मंत्र बिचारो । 
जाय सहाय भयो तबही, अहिरावण सैन्य समेत संहारो ।। 


काज किए बड़ देवन के तुम, वीर महाप्रभु देखि बिचारो । 
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसे नहिं जात है टारो । 
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो ।। 
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।। 

Monday, May 23, 2016

पृथ्वी से सूर्य की दूरी

 जुग सहस्त्र जोजन पर भानू 
लिल्यो ताहि मधुर फल जानू ।।


युग = 12000  ............सहस्त्र = 1000 ........ 1 योजन = 8 मील
युग x सहस्त्र x योजन = 12000 x 1000 x 8 मील (1 मील= 1.6 KM)

तो 96000000 मील = 96000000 x 1.6 किलो मीटर =1536000000
( EXACTLY NASA की ख़ोज )
ये प्रमाणित करता है कि हम दुनिया भर के देशों से कई हजार वर्ष पहले ही ज्ञान को

प्राप्त कर चुके थे। और सनातन धर्म व विज्ञान दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

हनुमान चालीसा

॥दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

॥चौपाई॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥

लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥

॥दोहा॥

पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥